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मिलेनियम पार्क और फेरी सेवा पर लगा ताला
कोलकाता, 3 अप्रैल। बंगाल में चुनावी रंजिश की आग अब महानगर के हृदय स्थल तक पहुँच गई है। कोलकाता के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के बाहर हुई हिंसक झड़प और उपजे भारी तनाव को देखते हुए प्रशासन ने कड़े सुरक्षात्मक कदम उठाए हैं। कोलकाता पुलिस ने एहतियातन प्रसिद्ध मिलेनियम पार्क को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का आदेश जारी कर दिया है। इसके साथ ही हावड़ा और कोलकाता की लाइफलाइन मानी जाने वाली शिपिंग जेटी घाट की फेरी सेवा को भी तत्काल प्रभाव से रोक दिया गया है।
पुलिस की इस अति-सक्रियता ने पूरे स्टैंड रोड इलाके को एक छावनी में तब्दील कर दिया है, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने इलाके में भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 (पूर्व में धारा 144) लागू कर दी है। पुलिस ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दो तृणमूल पार्षदों शांतिरंजन कुंडू और सचिन सिंह समेत छह लोगों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज की है। इन सभी पर गैर-जमानती धाराओं के तहत मुकदमा चलाया गया है।
पुलिस के अनुसार, अगले आदेश तक किसी भी प्रकार के जमावड़े पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। पार्क के भीतर मौजूद लोगों को भी बाहर निकाल दिया गया है और स्टैंड रोड के एक महत्वपूर्ण हिस्से को पूरी तरह सील कर दिया गया है। इस पूरे विवाद की जड़ में फॉर्म-6 यानी मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया है। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि बाहरी राज्यों के लोगों के नाम अवैध तरीके से बंगाल की मतदाता सूची में शामिल किए जा रहे हैं। इसी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन के दौरान तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते विवाद ने हिंसक रूप ले लिया और बैरिकेडिंग तोड़कर दोनों पक्षों के बीच जमकर हाथापाई और तोडफ़ोड़ हुई। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि केंद्रीय बलों और स्थानीय पुलिस को लाठीचार्ज की नौबत तक आने के बाद मोर्चा संभालना पड़ा।
प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा कारणों से उठाए गए ये कदम शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। हावड़ा और कोलकाता के बीच फेरी सेवा बंद होने से दैनिक यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन पुलिस का तर्क है कि संवेदनशीलता को देखते हुए किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरती जा सकती। निर्वाचन आयोग ने भी इस घटना पर रिपोर्ट तलब की है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर स्पष्ट है कि बंगाल का यह चुनाव केवल मतपेटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील होता जा रहा है।